मुंबई। दिग्गज भारतीय फिल्म अभिनेता मनोज कुमार का शुक्रवार को निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। वह कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती थे एवं उन्हें लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां थी।
मनोज कुमार के बेटे कुणाल गोस्वामी ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार शनिवार को किया जाएगा। फिल्म निर्देशक मनोज कुमार को देशभक्ति फिल्मों के लिए जाना जाता था। उनके निधन पर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने शोक व्यक्त किया है।
मनोज कुमार को फिल्म उद्योग में उनके योगदान पर 1992 में पद्मश्री एवं 2015 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।वर्ष 1965 में ही मनोज कुमार की एक और सुपरहिट फिल्म गुमनाम भी प्रदर्शित हुयी। इस फिल्म में रहस्य और रोमांस के ताने बानेसे बुनी मधुर गीत संगीत और ध्वनि के कल्पनामय इस्तेमाल किया गया था।
वर्ष 1965 में ही मनोज कुमार को विजय भटृ की फिल्म हिमालय की गोद में काम करने का मौका मिला जो टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। इस फिल्म में भी मनोज कुमार की नायिका माला सिन्हा थी। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म शहीद मनोज कुमार के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है।
देशभक्ति के जज्बे से परिपूर्ण इस फिल्म में मनोज कुमार ने भगत सिंह की भूमिका को रूपहले पर्दे पर जीवंत कर दिया। फिल्म से जुड़ा दिलचस्प तथ्य है कि मनोज कुमार के ही कहने पर गीतकार प्रेम धवन ने न इस फिल्म के गीत लिखे साथ ही फिल्म का संगीत भी दिया।उनके रचित गीत ऐ मेरे प्यारे वतन.. और मेरा रंग दे बसंती चोला.. आज भी उसी तल्लीनता से सुने जाते हैं जिस तरह उस दौर में सुने जाते थे।
वर्ष 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश में किसान और जवान की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए जय जवान जय किसान..का नारा दिया और मनोज कुमार से इसपर फिल्म बनाने की पेशकश की। बाद में मनोज कुमार ने फिल्म उपकार का निर्माण किया।
वर्ष 1967 में प्रदर्शित फिल्म उपकार में मनोज कुमार ने किसान की भूमिका के साथ ही जवान की भूमिका में भी दिखाई दिए। फिल्म में उनके चरित्र का नाम भारत था बाद में इसी नाम से वह फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर हो गए।
वर्ष 1970 में मनोज कुमार के निर्माण और निर्देशन में बनी एक और सुपरहिट फिल्म पूरब और पश्चिम प्रदर्शित हुई। फिल्म के जरिये मनोज कुमार ने एक ऐसे मुद्दे को उठाया जो दौलत के लालच में अपने देश की मिट्टी को छोड़कर पश्चिम में पलायन करने को मजबूर है। वर्ष 1972 में मनोज कुमार के सिने करियर की एक और महत्वपूर्ण फिल्म शोर प्रदर्शित हुई।
वर्ष 1974 में प्रदर्शित फिल्म रोटी कपड़ा और मकान मनोज कुमार के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म के जरिये मनोज कुमार ने समाज की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट की साथ ही आम आदमी की जिंदगी में जरूरी रोटी, कपड़ा और मकान के मुद्दे को उठाया।
वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म दस नंबरी की सफलता के बाद मनोज कुमार ने लगभग पांच वर्षो तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया। वर्ष 1981 में मनोज कुमार ने फिल्म क्रांति के जरिये अपने सिने करियर की दूसरी पारी शुरू की। दिलचस्प बात है इसी फिल्म के जरिये मनोज कुमार के आदर्श दिलीप कुमार ने भी अपने सिने करियर की दूसरी पारी शुरू की थी। देशभक्ति के जज्बे से परिपूर्ण फिल्म में मनोज कुमार और दिलीप कुमार की जोड़ी को जबरदस्त सराहना मिली।
वर्ष 1983 में अपने पुत्र कुणाल गोस्वामी को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने के लिये मनोज कुमार ने फिल्म पेन्टर बाबू का निर्माण किया लेकिन कमजोर पटकथा और निर्देशन के कारण फिल्म टिकट खिड़की पर औंधे मुंह गिरी। फिल्म की असफलता से मनोज कुमार ने लगभग छह वर्ष तक फिल्म निर्माण से किनारा कर लिया। वर्ष 1989 में मनोज कुमार एक बार फिर से फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में वापस आये और फिल्म क्लर्क का निर्माण किया, लेकिन दुर्भाग्य से यह फिल्म भी टिकट खिड़की पर असफल साबित हुई। वर्ष 1999 में प्रदर्शित फिल्म जय हिंद बतौर निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार के सिने करियर की अंतिम फिल्म साबित हुई जो टिकट खिड़की पर बुरी तरह नकार दी गई।
मनोज कुमार अपने सिने करियर में सात फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। इन सबके साथ ही फिल्म के क्षेत्र में मनोज कुमार के उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 2002 में पदमश्री पुरस्कार, वर्ष 2008 में स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार और वर्ष 2016 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।