सबगुरु न्यूज -सिरोही। हाल में सिरोही भाजपा ने शेष रहे अपने 9 मंडल अध्यक्ष घोषित किए। इनमें माउंट आबू के मंडल अध्यक्ष अक्षय चौहान भी शामिल हैं। मंडल अध्यक्ष चुने जाने के बाद इनका जगह जगह अभिनन्दन हो रहा है। इसकी तस्वीरें चौहान ने अपने फेसबुक वाल पर शेयर की हैं। इन्हीं तस्वीरों को देखते हुए एक पोस्ट ने यकायक ध्यान खींचा। ये पोस्ट थी समाराम गरासिया के यहां होली मिलन समारोह की।
इस पोस्ट को देखने के बाद इसी तारीख के आसपास की पिंडवाड़ा विधायक समाराम गरासिया की फेसबुक आईडी भी खंगाली तो इस कार्यक्रम से जुड़ी तस्वीरें उनकी वाल पर भी थी। अक्षय चौहान की पोस्ट में कुछ नाम हैं तो विधायक की पोस्ट में उन नामों से जुड़ी तस्वीरें।
इनमें से कुछ नाम देखने पर सिरोही में जिला भाजपा के द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह की वो खबर आंखों के सामने तैर गई जो जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी ने अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट की थी। एक खबर में जिला स्तरीय होली मिलन समारोह में जिन नेताओं के नहीं पहुंचने की सुगबुगाहट थी। उनके नाम थे। ये बात अलग है कि खुद रक्षा भंडारी ने 16 मार्च को अपनी फेसबुक वाल पर दी हुईं पोस्ट में उन नेताजी का नाम देकर उपस्थिति बताई है जिनके नहीं उपस्थित होने का समाचार प्रकाशित हुआ था। ये बात अलग है कि रक्षा भंडारी की इसी पोस्ट के साथ जुड़ी 28 और अन्य पोस्ट की 16 तस्वीरों और वीडियो में वो चेहरे नहीं दिखे जिनकी अनुपस्थित होने की खबर प्रकाशित हुई थी और वो उनके उपस्थित होने का लिख रही थी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जिला स्तरीय होली कार्यक्रम में जो नेता गैर मौजूद थे सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार वो समाराम गरासिया के द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल बताए गए। इनके नाम अक्षय चौहान की पोस्ट में और चेहरे समाराम गरासिया की पोस्ट फोटो में नजर आए। तो संगठन में ही सवाल ये उठने लगा कि सिरोही के कार्यक्रम की खबर और तस्वीरों में इन लोगों के नाम शामिल नहीं किया गया या आमंत्रित नहीं किए गए । या फिर ये लोग वाकई सिरोही में जिला भाजपा के द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल नहीं हुए थे।
सभी स्थितियों में सिरोही के राजनीतिक हलकों में एक सवाल उठ रहा है कि क्या नया जिलाध्यक्ष मिलने के बाद भी सिरोही भाजपा में मतभेद कम हुये है या पुराने स्तर से आगे निकल गये हैं। यूं तो जिला स्तरीय होली मिलन समारोह के एक समाचार का शीर्षक ही जिलाध्यक्ष के हवाले से ‘मतभेद भुलाकर दूरियां खत्म कर मनाएं होली’ का दिया हुआ है। लेकिन, भाजपा की चर्चाएं तो यही बता रही हैं कि ये आह्वान कुछ खास रंग नहीं लाया है।
-दूसरे कार्यक्रम में गैर मौजूदगी इत्तेफाक या मनमुटाव
रक्षा भंडारी के जिलाध्यक्ष बनने के बाद विशुद्ध रूप से जिला भाजपा के द्वारा आयोजित ये दूसरा कार्यक्रम था। पहला कार्यक्रम था फरवरी में केंद्रीय बजट के बाद रेवदर में बजट पर आमजन से चर्चा का कार्यक्रम। ये कार्यक्रम रेवदर विधानसभा में था। उसमें आबूरोड शहर भी आता है और जीरावल भी। ये वो जगह हैं जहां पूर्व जिलाध्यक्षों के निवास स्थान हैं तथा इनकी विधानसभाएं भी हैं। इसके बावजूद इन लोगो के इसमें नजर नहीं आने की सुगबुगाहट उस समय चरम पर रही।
इसके बाद सिरोही में आयोजित दूसरे जिला स्तरीय कार्यक्रम होली मिलन समारोह में भी इनके मौजूद नहीं रहने की चर्चा रही। जबकि समाराम गरासिया के यहां के होली मिलन समारोह की गरासिया की वाल पर जारी फोटो और चौहान द्वारा अपने वाल पर जारी की गई सूचना ये बता रही है कि नारायण पुरोहित, सुरेश कोठारी, योगेन्द्र गोयल आदि जैसे भाजपा के पूर्व पदाधिकारियों की मौजूदगी विधायक के कार्यक्रम में थी। यही नहीं पूर्व नेतृत्व की तरह वर्तमान नेतृत्व द्वारा भी संगठन की गतिविधियों के लिए सरूपगंज के जिस स्थान के इस्तेमाल को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है उस आयोजन स्थल के संचालक की भी मौजूदगी और गैर मौजूदगी की चर्चा उस समय थी।
-सहमति जताई तो फिर नदारदगी क्यों?
अब सिरोही भाजपा में अंदरखाने एक सवाल उठने लगा है। वो ये कि जब रक्षा भंडारी को जिलाध्यक्ष बनाने में इन सब लोगों की सहमति थी तो फिर अब जिला भाजपा द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में इन लोगों की गैर मौजूदगी क्यों है? या फिर इन लोगों पर प्रदेश संगठन ने दबाव डालकर ये आम सहमति बनवाई। अंदरखाने जो चर्चा है उसके अनुसार सिरोही भाजपा में साल दर साल चली आ रही इस गुटबाजी की जड़ में कहीं ना कहीं सिरोही विधानसभा से टिकिट की दौड़ के लिए डेढ़ दशक से चल रही क्रमवार घटनाओं में है।
डेढ़ दशक पहले जिले में विनोद परसरामपुरिया पूरे उभार पर थे। जिले में भाजपा के टिकिट के आकांक्षी दो प्रमुख नामों में एक तीसरा नाम और जुड़ गया था। इससे यहां त्रिकोणीय गुटबाजी का दौर शुरू हुआ। ये बात अलग है कि उस समय ओटाराम देवासी के नाम से नया चेहरा सिरोही विधानसभा को दे दिया गया। इसके बाद 2011 में जिला परिषद चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला था और विनोद परसरामपुरिया जिला प्रमुख पद के भाजपा के प्रत्याशी थे। लेकिन, भाजपा में भीतर घात हो जाने के कारण वो कांग्रेस प्रत्याशी चंदनसिंह देवड़ा से हार गए और एक तरह से राजनीतिक संन्यास की स्थिति में चले गए।
इस घटना के बाद सिरोही डाक बंगले में हुई जिला भाजपा की बैठक में एक प्रस्ताव लिया गया। इसमें उन लोगों के नाम लिए गए जिन लोगों पर विनोद परसरामपुरिया के साथ भीतरघात करने के आरोप लगाए थे। इनके खिलाफ निंदा प्रस्ताव रखा गया। इसका प्रस्ताव रखा था शिवगंज क्षेत्र के तत्कालीन भाजपा पदाधिकारी ने और भीतरघात में कथित रूप से शामिल जिला भाजपा नेताओं के साथ जिला परिषद सदस्यों के खिलाफ ये निंदा प्रस्ताव पास करके इन लोगों पर कार्रवाई के लिए प्रदेश संगठन को लिखा गया था।
परसरामपुरिया से भीतरघात की घटना लंबे समय से यहां चली आ रही गुटबाजी का परिणाम मानी जाती है। तब 2013 के विधानसभा के लिए चुनावी चौसर बिछनी शुरू हो गई थी और उस समय परसरामपुरिया समर्थकों के ये आरोप था कि परसरामपुरिया विरोधी खेमे का ये मानना था कि जिला प्रमुख बनने के बाद विधानसभा चुनाव में एक और प्रतिद्वंद्वी सामने आ जाएगा। इस कारण भीतर घात किया गया।
2015 के जिला प्रमुख चुनाव में भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष नारायण पुरोहित के भाई की पत्नी लक्ष्मी पुरोहित और विनोद परसरामपुरिया की पुत्रवधु पायल परसरामपुरिया ने भाजपा से जिला प्रमुख के लिए नामांकन दाखिल किया। पार्टी ने पायल परसरामपुरिया को अपना उम्मीदवार घोषित किया और वो जिला प्रमुख बनीं।
इसके बाद आई 2025 में जिलाध्यक्ष की चयन प्रक्रिया। वो सारे गुट अब भी सक्रिय थे। पश्चिमी राजस्थान के जिस जिले में महिला जिलाध्यक्ष चुना जाना था उनमें अंतिम क्षणों में सिरोही को शामिल कर लिए गया। इस समय जिलाध्यक्ष के दावेदारों में प्रकाश गुप्ता के विश्वस्त योगेन्द्र गोयल और पायल परसरामपुरिया प्रमुख नाम थे। इनके अलावा गणपत सिंह, समेत करीब 12 जनों ने नामांकन दाखिल किए थे। लेकिन, चुनाव के सुबह एकाएक रक्षा भंडारी के नाम पर सभी आवेदकों के सहमति जताने का दावा किया गया और दोपहर को उन्हें जिलाध्यक्ष घोषित कर दिया गया।
संगठन में अंदरखाने चर्चा रही है कि मूल नामांकनों में पायल परसरामपुरिया ही महिला थी। महिला के लिए सिरोही को चयन के लेने के कारण पायल परसरामपुरिया का जिलाध्यक्ष बनना लगभग तय माना जा रहा था। आरोप ये लगा कि पायल परसरामपुरिया को जिलाध्यक्ष बनने से रोकने के लिए 2011 और 2015 में जिला प्रमुख चुनाव के लाभार्थी, प्रतिद्वंद्वियों और आरोपों के घेरे में आए सभी नेताओं ने ये कदम उठाया।
जिले में विनोद परसरामपुरिया के बाद करीब 10 साल तक से भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री प्रकाश गुप्ता के करीबियों का जिलाध्यक्ष पद पर कब्जा रहा। योगेन्द्र गोयल भी इन्हीं के विश्वस्त माने जाते हैं। लेकिन, पार्टी सूत्रों का कहना था कि प्रदेश स्तर पर रक्षा भंडारी का नाम भेजा गया और इन सबने पायल को काटने के लिए रक्षा के नाम पर सहमति जता दी। एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र के के अनुसार भंडारी भाजपा के एक अन्य पूर्व संगठन महामंत्री चंद्रशेखर मिश्र की विश्वस्त बताई गई। संगठन के नेता सिरोही भाजपा में प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं की सीधी दखल मानते हैं। सिरोही कांग्रेस नेता ने मुख्यमंत्री पर उनकी टिप्पणी पर भाजपा प्रभारी राधामोहन अग्रवाल की प्रतिक्रिया को रिपोस्ट करते हुए लिखा भी था कि भाजपा जिला और मंडल अध्यक्षों के नाम के नामांकन दाखिल करवाकर पाखंड करती है।
अब चर्चा ये है कि जिले के भाजपा नेताओं ने एक कांटे को निकालने के लिए दूसरे कांटे का इस्तेमाल करने की कहावत को चरितार्थ तो कर लिया लेकिन दूसरे कांटे को भी मन से नहीं निकाल पाए। अब प्रदेश के दो पूर्व संगठन महामंत्रियों के अलावा अन्य नेताओं के विश्वस्तों में खींचतान की स्थिति है।
संगठन में चकल्लस ये है कि इसकी वजह से एक नेता की विश्वस्त माने जाने वाली रक्षा भंडारी के जिलाध्यक्ष बनने के बाद हुए जिला संगठन के दो विशुद्ध कार्यक्रमों में प्रदेश स्तरीय दूसरे नेता के विश्वस्त माने जाने वाले जिला स्तरीय नेता शामिल नहीं हुए। यूं ओम बिड़ला और मदन राठौर के आगमन पर हुए सम्मान समारोह में ये लोग शामिल हुए थे। लेकिन, उसकी वजह जिला संगठन की बजाय दोनों नेताओं से व्यक्तिगत निकटता ज्यादा बताई जा रही है। प्रदेश के दो पूर्व नेताओं के विश्वस्तों और स्थानीय क्षत्रपों में सिरोही में चल रही इस कथित खींचतान से जिला भाजपा में नजरअंदाज कर दिए गए पुराने कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियो में संगठन के हाल पर निराशा भी है तो मुस्कान भी। स्वेच्छा से निर्णय का बाद अब ये मतभेद संसाधन पर कब्जे के लिए है या मिजोगायनिज्म (misogynism) की वजह से ये संगठन ज्यादा बेहतर से स्पष्ट कर सकेगा।