कितना तथ्यात्मक मंत्री और विधायक एकजैसा पत्र!

राज्यमंत्री ओटाराम देवासी और पिंडवाड़ा आबू विधायक समाराम गरासिया।

परीक्षित मिश्रा
सबगुरु न्यूज-सिरोही। पंचायतीराज राज्यमंत्री ओटाराम देवासी और आबू-पिण्डवाडा विधायक समाराम गरासिया ने अपने पत्र में माउण्ट आबू के नाम को लेकर जो लिखा वो बाडमेर के विधायक प्रतापपुरी ने विधानसभा में बोला। हो सकता है कि इनकी माउण्ट आबू को लेकर धार्मिक भावनाएं सही हों कि वहां पर अपत्तिजनक चीजें बंद होनी चाहिए। लेकिन, मुख्यमंत्री के नाम दिए गए पत्र में देवासी और गरासिया नाम को लेकर वही गलती दोहरा गए जो प्रतापपुरी ने अपने भाषण में की। देवताओं के वास वाले दूसरे तथ्य में प्रतापपुरी ने संख्या नहीं बताई लेकिन, सिरोही के दोनों नेताओं ने माउण्ट आबू में रहने वाले देवी देवताओं की संख्या का खुलासा कर दिया।

अपने इन दोनों हीं तथ्यों के स्रोत इन लोगों ने पत्र में नहीं दिया, यदि स्रोत देते तो अपने मुद्दे को और भी प्रभावशाली तरीके से सरकार के समक्ष रख सकते थे। प्रतापपुरी के भाषण के दूसरे दिन ही पत्र जारी करना तथ्यों के अध्ययन से ज्यादा औपचारिकता को प्रदर्शित कर रही है। इसलिए ओम बिडला और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड ने भाजपा के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं को किसी भी मुद्दे पर बात करने से पहले अध्ययन करने की नसीहत दी थी।
-नहीं बताया कब और किसने बदला नाम
इन लोगों ने अपने पत्रों में लिखा कि तत्कालीन सरकार ने माउण्ट आबू का नाम आबूराज से बदलकर माउण्ट आबू किया। लेकिन, इन्होंने ये नहीं लिखा कि किस काल की सरकार ने। इनके इस पत्र में नाम को लेकर सोशल मीडिया पर लोग अपनी पक्ष और विपक्ष की राय भी करते रहे। लेकिन, सवाल वही है कि क्या वाकई माउण्ट आबू का नाम आबूराज रहा है। सबसे पहला उद्धहरण उस धर्मग्रंथ का देना जरूरी है जिसे इन्हें पढना चाहिए क्योंकि ये उस संगठन के नेता हैं जो स्वयं को राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की अगुआ मानती है। वो धर्मग्रंथ है स्कंधपुराण। इसके श्लोक संख्या 7.3.3.23 में इस क्षेत्र की खाई को भरने के लिए हिमालय के पास गए ऋषि वशिष्ट के अनुरोध की पूर्ति के लिए अर्बुद नाग हिमालय के पुत्र और अपने मित्र नंदीवर्धन से कहते हैं कि

मन्नाम्ना ख्यातिमायातु नान्यत्किंचिद्वृणोम्यहम् ।
ततः सोऽपि प्रतिज्ञाय आरूढस्तस्य चोपरि ।
प्रणम्य पितरौ चैव प्रतस्थे मुनिना सह ॥ 7.3.3.23 ॥
अर्थात ये क्षेत्र मेरे नाम से जाना जाए और इसका मेरे उपर कोई ़़ऋण नहीं हो।

इसी कारण स्कंध पुराण के अलावा मतस्य पुराण, वायु पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत में भी इसे अर्बुद पर्वत के नाम से उद्धृत किया गया। पौराणिक काल में सभी पुराणों में इस क्षेत्र का नाम अर्बुद पर्वत मिलता है।
प्रचीनकाल में भी इस क्षेत्र का नाम अर्बुद पर्वत और आबू पर्वत ही मिलता है। सिरोही गेजेटियर के अनुसार 625 ईस्वी का पिण्डवाड के निकट बसंतगढ का शिलालेख इसकी पुष्टि करता है। इसमें लिखा है कि रजिल्ला ने अर्बुद पर्वत की रक्षा की जिसकी राजधानी वाता यानि कि बसंतगढ़ थी। ग्यारहवी शताब्दी का परमार काल का शिलालेख परमारों के शासन को आबू पर्वत के दूसरे छोर तक विस्तृत बताता है।
मध्यकालीन इतिहास में सिरोही में देवडा वंश की स्थापना के इतिहास में देलवाडा, अचलगढ और टोकरा के शिलालेखो का हवाला देते हुए डा दशरथ शर्मा लिखते हैं कि प्रतापमाला का पुत्र वीजड जिसे दशरथ के नाम से जाना जाता था उसने आबू क्षेत्र में देवडा राजवंश की स्थापना की। पूरे मध्यकाल के एतिहासिक दस्तावेजों और शिलालेखों में इस क्षेत्र का नाम आबू या आबू पर्वत ही मिलता है।
आधुनिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है संविधान सभा की बहस। इसी में 16 नवम्बर 1949 को सिरोही रियासत को लेकर जयनारायण व्यास, गोकुलभाई भट्ट और सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच की बहस मिलती है। इसमें सिरोही रियासत को दो हिस्से में करके एक हिस्से को राजस्थान में और दूसरे हिस्से को मुंबई प्रांत में करने का जिक्र होता है। इसमें भी इस क्षेत्र का नाम आबू पर्वत लिखा गया है।
पुराण और इतिहास दोनों में ही इस क्षेत्र का नाम भाजपा नेताओं के बताए अनुसार आबूराज से बदलकर आबू पर्वत करने का जिक्र नहीं मिलता। सभी जगह अर्बुद पर्वत और आबू पर्वत नाम मिलता है। पर्वत को अंग्रेजी में माउण्ट कहते हैं इसलिए संभवतः अंग्रेजों के सेनीटोरियम बनाने के बाद इसे माउण्ट आबू के नाम से जाना जाने लगा हो।
हो सकता है कि बोलचाल की भाषा में इस क्षेत्र को आबूराज कहा जाता हो। देवासी और गरासिया के पत्र में किसी सरकार द्वारा इस क्षेत्र का नाम आबूराज से बदल कर माउण्ट आबू करने की बात उनकी निजी भावना जरूर हो सकती है लेकिन, इसका कोई पौराणिक और ऐतिहासिक राजनीतिक साक्ष्य उन्होंने नहीं दिया। न ही ऐसा कोई जिक्र वो खुद भी कर पाए हैं।
वे चाहते तो किसी सरकार के द्वारा नाम बदलने का हवाला दिए बिना ही जनभावना के अनुसार इस क्षेत्र का नाम आबूराज करने की मांग सरकार से कर सकते थे। लेकिन, दोनों ने ही उस सरकार और उस कालखण्ड का कोई ब्योरा नहीं दिया जब माउण्ट आबू का नाम आबूराज था। यदि वो दस्तावेजों से आबूराज का नाम बदलकर माउण्ट आबू करने की घटना 1526 के 1757 के बीच का सिद्ध कर सकेंगे तो इसका नाम बदलने में और भी आसान हो जाता।
– तैंतीस करोड देवी देवता या एक करोड तीर्थ
इसी पत्र में ओटाराम देवासी और समाराम गरासिया ने ये जिक्र किया है कि आबू पर्वत पर तैंतीस करोड़ देवी देवताओं का वास है। लेकिन, इस क्षेत्र के देवीय और धार्मिक महत्व बताने वाले एकमात्र ग्रंथ अर्बुद पुराण में इससे अलग तथ्य मिलता है। अर्बुद खण्ड के अध्याय संख्या पचास के दो श्लोकों में इसका उल्लेख है। इसमें ऋषि पुलत्स्य राजा ययाति को अर्बुद पर्वत का महात्म्य बताते हुए कहते हैं।

तिस्रः कोट्योऽर्धाकोटिश्च तीर्थानां भूमिवासिनम्।
तेषां कोटिस्ततोऽवत्सित्पर्वतेऽर्बुदसंज्ञके।।7.3.50.3।।
अर्थात पृथ्वी पर लगभग साढ़े तीन करोड़ तीर्थ स्थान थे। उनमें से लगभग एक करोड़ तीर्थ स्थान अर्बुद पर्वत पर स्थित थे।

इसी तरह श्लोक संख्या चार में शेष ढाई करोड तीर्थों का उल्लेख है।

पुष्करे च तथा कोटिः कुरूक्षेत्रे च पार्थिव।
वर्णनस्यमर्दकोटिः स्तुता देवैः सवसवैः।
राजन्नेतानि रक्षन्ति सर्वे देवाः सवसवः ।।7.3.50.4।।
अर्थात पुष्कर में एक करोड़, कुरुक्षेत्र में एक करोड़ , वाराणसी में लगभग आधा करोड़। देवताओं ने स्वयं तीर्थस्थानों की ऐसी ही संख्या गाई है। हे राजन! सभी देवता मिलकर उनकी रक्षा करते थे।
लेकिन, 33 करोड देवी देवताओं का कहीं कोई जिक्र स्कंध पुराण, मतस्य पुराण, वायु पुराण, महाभारत में कहीं नहीं मिला। इस तथ्य का भी धार्मिक और ऐतिहासिक स्रोत ये नेता अपने पत्र में नहीं दे पाए।