बेंगलूरु। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह सी आर मुकुंदा ने बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हाल ही में हुए हमलों की शुक्रवार को कड़ी निंदा की और ऐसे हमलों को बर्बर तथा अत्यधिक निंदनीय करार दिया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संघर्षग्रस्त मणिपुर में पूर्ण शांति बहाल करना एक क्रमिक प्रक्रिया होगी।
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए मुकुंदा ने बांग्लादेश में स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं सभ्य समाज में मानवता और लोकतंत्र के किसी भी मानक से शर्मनाक हैं। उन्होंने बांग्लादेश में स्थिति के लिए जिम्मेदार कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन करने में आरएसएस स्वयंसेवकों और विभिन्न संगठनों के प्रयासों की सराहना की।
आरएसएस के सह सरकार्यवाह ने इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय राय जुटाने के साथ-साथ बंगलादेशी अधिकारियों से हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह करने में भारत सरकार के सक्रिय रुख की भी सराहना की। उन्होंने कहा बांग्लादेश में हिंदुओं की जान और संपत्ति खतरे में है। हालांकि, यह सराहनीय है कि ऐसी परिस्थितियों में भी, वहां का हिंदू समुदाय आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ हमलावरों के खिलाफ मजबूती से खड़ा है।
मुकुंदा ने वैश्विक समुदाय से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि इस मुद्दे पर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) में औपचारिक रूप से चर्चा की जाएगी, जिसका प्रस्ताव जल्द ही मीडिया के साथ साझा किया जाएगा।
बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने मणिपुर में शांति को बढ़ावा देने के लिए आरएसएस की प्रतिबद्धता पर प्रकाश डाला और राज्य के विभिन्न समुदायों जिनमें मैतेई, कुकी और आदिवासी समूह शामिल हैं, के बीच संवाद को सुविधाजनक बनाने में संघ की भूमिका पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि आरएसएस ने इम्फाल, गुवाहाटी और दिल्ली में इन समुदायों के नेताओं के बीच कई बैठकें आयोजित की हैं, जिसका उद्देश्य सद्भाव बहाल करना है। हालांकि स्थिति की जटिलताएं नकारा नहीं जा सकता लेकिन संगठन विश्वास को फिर से बनाने और सुलह को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है।
मुकुंदा ने संघर्षग्रस्त राज्य में आरएसएस द्वारा किए जा रहे मानवीय प्रयासों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने उल्लेख किया कि स्वयंसेवकों ने विस्थापित व्यक्तियों को भोजन, आश्रय और अन्य आवश्यकताओं के साथ सहायता करने के लिए सैकड़ों राहत शिविर स्थापित किए हैं।
उन्होंने कहा कि हालांकि इसने कुछ स्थिरता प्रदान की है, लेकिन पूर्ण शांति का मार्ग अभी भी लंबा है। उत्तर-दक्षिण विभाजन के बहुचर्चित मुद्दे पर, आरएसएस के सह सरकार्यवाह ने ऐसी चिंताओं को राजनीति से प्रेरित बताकर खारिज कर दिया।
परिसीमन की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया था कि दक्षिणी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों का अनुपात अपरिवर्तित रहेगा जिससे आरएसएस ने इस मामले पर तटस्थ रुख बनाए रखा। उन्होंने रुपये के प्रतीक और भाषा से संबंधित विवादों पर बहस जैसे राजनीतिक रूप से प्रेरित आख्यानों की भी आलोचना की, उन्होंने कहा कि इन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप के बजाय सामाजिक संवाद के माध्यम से हल किया जाना चाहिए।
मुकुंदा ने जोर देकर कहा कि आरएसएस न्याय के लिए खड़ा है और ऐसे मामलों को सौहार्दपूर्ण ढंग से संबोधित करने में विश्वास करता है। वर्ष 2025 में आरएसएस अपनी शताब्दी के करीब पहुंच रहा है, इस अवसर पर उन्होंने अपने स्वयंसेवकों की विकसित होती जनसांख्यिकी के बारे में बात की और बताया कि संगठन में अब समाज सेवा, ट्रेड यूनियन और कृषि सहित विभिन्न क्षेत्रों में एक करोड़ से अधिक सक्रिय सदस्य हैं।
उन राज्यों में संघ के बढ़ते प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए जहां पहले इसकी सीमित उपस्थिति थी, उन्होंने तमिलनाडु, बिहार और ओडिशा का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अकेले तमिलनाडु में शाखाओं की संख्या 4,000 को पार कर गई है।
सरकार्यवाह ने आरएसएस के विस्तार के विरोध के दावों को भी खारिज कर दिया, उन्होंने कहा कि जहां विरोध मौजूद है, वह धार्मिक नहीं बल्कि काफी हद तक राजनीतिक है। उन्होंने आत्मविश्वास से कहा कि हमारा मानना है कि इन मतभेदों को बातचीत और परामर्श के माध्यम से सुलझाया जा सकता है।
भाषा के मुद्दे पर एक प्रश्न का उत्तर देते हुए मुकुंदा ने शिक्षा और दैनिक जीवन में मातृभाषा के महत्व पर आरएसएस के जोर को दोहराया। उन्होंने बताया कि संगठन ने लोगों को कई भाषाएँ सीखने के लिए प्रोत्साहित करने, अपनी मातृभाषा, अपने निवास स्थान की क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी जैसी करियर-उन्मुख भाषा में दक्षता की वकालत करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया है।
मुकुंदा ने कहा कि सरसंघचालक मोहन भागवत ने लगातार मातृभाषा को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में भाषाई विविधता को प्रोत्साहित किया है।